From 5d3b025dd35c7942325df669b7015140be36f6f3 Mon Sep 17 00:00:00 2001 From: Padmaja1504 Date: Sun, 19 Jul 2026 17:26:45 +0530 Subject: [PATCH] Update 21047.txt --- sutraani/kashika/21047.txt | 2 +- 1 file changed, 1 insertion(+), 1 deletion(-) diff --git a/sutraani/kashika/21047.txt b/sutraani/kashika/21047.txt index b6ac7d3fd..246fcc55a 100644 --- a/sutraani/kashika/21047.txt +++ b/sutraani/kashika/21047.txt @@ -1 +1 @@ -क्षेपो निन्दा। क्षेपे गम्यमाने सप्तम्यन्तं क्तान्तेन सह समस्यते, तत्पुरुषश्च समासो भवति। अवतप्तेनकुलस्थितं तवैतत्। चापलमेतत् तव, अनवस्थितत्वं तवैतदित्यर्थः। उदकेविशीर्णम्। प्रवाहेमूत्रितम्। भस्मनिहुतम्। निष्फलं यत् क्रियते तदेवमुच्यते। <<तत्पुरुषे कृति बहुलम्>> [[६.३.१४]] इत्यलुक्॥ \ No newline at end of file +क्षेपो निन्दा। क्षेपे गम्यमाने सप्तम्यन्तं क्तान्तेन सह समस्यते, तत्पुरुषश्च समासो भवति। अवतप्तेनकुलस्थितं तवैतत्। चापलमेतत् तव, अनवस्थितत्वं तवैतदित्यर्थः। उदकेविशीर्णम्। प्रवाहेमूत्रितम्। भस्मनिहुतम्। निष्फलं यत्क्रियते तदेवमुच्यते। <<तत्पुरुषे कृति बहुलम्>> [[६.३.१४]] इत्यलुक्॥